मध्यप्रदेश के आदिवासियों को, उनका वनाधिकार हक़ दिलाएगी कमलनाथ सरकार*  *आदिवासियों के कल्याण और उनके हितों की चिंता हमेशा कांग्रेस ने ही की है - शोभा ओझा* 
September 13, 2019 • धर्मेंद्र शुक्ला

*मध्यप्रदेश के आदिवासियों को, उनका वनाधिकार हक़ दिलाएगी कमलनाथ सरकार* 

*आदिवासियों के कल्याण और उनके हितों की चिंता हमेशा कांग्रेस ने ही की है - शोभा ओझा* 

भोपाल, 13 सितंबर, 2019 । 

मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी मीडिया विभाग की अध्यक्षा श्रीमती शोभा ओझा ने आज जारी अपने वक्तव्य में कहा कि आदिवासियों के साथ छल, कपट और उनके हितों के विरुद्ध केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा जान बूझकर की गई गलती को सुधारने का काम अब मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार कर रही है।  मध्यप्रदेश में वनाधिकार अधिनियम के तहत 3 लाख 60 हजार 181 वनवासी परिवारों को वनभूमि के अधिकार-पत्र पाने से वंचित होने से बचाने के लिए प्रदेश के लोकप्रिय और आदिवासियों के परम हितैषी मुख़्यमंत्री श्री कमलनाथ जी ने आदिवासियों को वनाधिकार हक़ दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में 12 सितंबर को तथ्यों और तर्कों के साथ मजबूती  से सरकार का पक्ष रखने के निर्देश संबंधितों को दिये थे, जिसका परिणाम यह हुआ की राज्य के अधिकारियों ने अभी तक की समीक्षा रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश कर दी है। साफ जाहिर है कि आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए कमलनाथ सरकार पूरी तरह से सजग और प्रतिबद्ध है। 

श्रीमती ओझा ने अपने बयान में आगे बताया कि कांग्रेस पार्टी ने विधानसभा चुनाव के समय अपने वचन-पत्र में यह कहा था कि वनाधिकार अधिनियम 2006 एवं संशोधन 2013 के तहत वन भूमि पर जिन कब्जाधारी आदिवासियों को पट्टा नहीं मिला है, उनको हम पट्टा दिलवाएंगे और उनकी भूमि को कृषि योग्य बनाएंगे। पट्टों की जगह मालिकाना हक़ देंगे। इस वचन को निभाने के लिए कमलनाथ सरकार तेज़ी के साथ गंभीर प्रयास कर रही है। 

श्रीमती ओझा ने कहा कि आदिवासी हितों के प्रति अपनी इसी गंभीरता के कारण मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ जी ने वनाधिकार अधिनियम के अंतर्गत तकनीकी कारणों से अस्वीकृत किए गए प्रकरणों की तत्काल समीक्षा कर, सकारात्मक निराकरण करने के निर्देश जिला कलेक्टरों को दिए। मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ ने कहा कि "तकनीकी कमियों को कारण पात्र परिवार वनाधिकार पट्टों से वंचित नहीं रहने चाहिए। कलेक्टर अपने विवेक से भी तकनीकी कमियों को दूर कर सकते हैं। तकनीकी कमियों के कारण अस्वीकृत प्रकरणों में कलेक्टर की जवाबदेही तय की जायेगी।"  मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ जी ने अधिकारियों से यह भी कहा कि "आदिवासी परिवारों से सबूत लाने के लिए जोर देने से बेहतर है कि स्वविवेक से उनकी मदद करें, ताकि उनके प्रकरणों का सकारात्मक निराकण हो सके।"

श्रीमती ओझा ने बताया की मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ जी ने इस कार्य को बेहतर तरीके से जल्द से जल्द संपन्न कर, इसे अमलीजामा पहनाये जाने के निर्देश अधिकारियों को दिए थे। मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ जी ने यह भी कहा था कि "टेक्नोलॉजी का उपयोग करने और वन अधिकार अधिनियम-2006 के तहत निरस्त दावों के बेहतर परीक्षण के लिए पूरी व्यवस्था को कम्प्यूटरीकृत करें।" 
इसीलिये राज्य सरकार द्वारा वन मित्र सॉफ्टवेयर को खरीद लिया गया है। निरस्त दावों के पुनर्परीक्षण के लिए प्रदेश सरकार, वन मित्र सॉफ्टवेयर का, अपने अनुकूल बदलाव करने के बाद उपयोग कर रही है। कमलनाथ सरकार ने आदिवासियों को वनाधिकार हक़ दिलाने और उनके हितों की रक्षा करने के लिए राज्य के सभी ग्राम रोजगार सहायकों को वनाधिकार पत्र भरवाने के लिए टैबलेट डिवाइस, टेक्नोलॉजी सहित दिए हैं। 

श्रीमती ओझा ने यह भी बताया कि वनाधिकार पत्र भरने के लिए आदिम जाति कल्याण विभाग इस कार्य को तेजी के साथ कर रहा है। आयुक्त आदिवासी कल्याण विभाग, मध्यप्रदेश शासन ने, वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत निरस्त दावों के पुनर्परीक्षण के लिए वन मित्र सॉफ्टवेयर अपने अनुकूल विकसित किया है। विभाग ने इसके लिए अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया और तीन लाख 60 हजार 181 दावों के पुनर्परीक्षण का कार्य शुरू हो गया है। जिसकी रिपोर्ट भी सुप्रीम कोर्ट में पेश कर दी गई है। 

श्रीमती ओझा ने बताया कि सॉफ्टवेयर द्वारा परीक्षण से दावों के निराकरण में त्वरित गति आएगी और पारदर्शिता भी रहेगी। 

श्रीमती ओझा ने कहा की आदिवासियों को वनाधिकार हक़ दिलाने में पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में आदिवासियों के हित में पक्ष रखने में कोई खास रुचि नहीं ली, इसलिए वनाधिकार न मिलने का यह संकट आदिवासियों के सामने खड़ा हो गया, जिसका हल  निकालने के लिए कांग्रेस की सरकार जुटी हुई है। 

श्रीमती ओझा ने जानकारी देते हुए बताया कि मध्यप्रदेश में लगभग 6 लाख 26 हज़ार 511 परिवारों ने, वनभूमि का हक पाने के लिए आवेदन किए। प्रदेश में वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत अब तक दो लाख 55 हजार 152 वन निवासियों को व्यक्तिगत, 27 हजार 967 को सामुदायिक एवं 3159 अन्य परंपरागत वर्ग को वन अधिकार-पत्र अब तक वितरित कर दिये गए हैं। 

श्रीमती ओझा ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय ने 13 फरवरी, 2019 को पारित आदेश में तीन लाख 60 हजार 181 आवेदनों को निरस्त करते हुए, कब्ज़ा हटाने को कहा था। जैसे ही मुख्यमंत्री श्री कमलनाथ जी को इस निर्णय की जानकारी लगी, उन्होंने तत्काल प्रभाव से अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार का पक्ष रखने के निर्देश दिए, जिससे आदिवासियों को उनके वनाधिकार का हक़ दिलाने में मदद मिल सके। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 28 फरवरी, 2019 को कहा कि छह माह से एक साल के भीतर आदिवासियों के दिसंबर 2005 के पूर्व के काबिज होने और अन्य के 75 साल से पहले के भूमि कब्जे के प्रमाण दिखाना होंगे। कमलनाथ सरकार ने इस संदर्भ में वंचित लोगों को उनका हक दिलाने के लिए कवायदें तेज कर दी हैं। 

अपने बयान के अंत में श्रीमती ओझा ने कहा कि प्रदेश की कमलनाथ सरकार की इस तत्परता के ठीक विपरीत, केंद्र की मोदी सरकार की घोर लापरवाही के कारण 17 प्रदेशों के 11 लाख 72 हजार 931 आदिवासियों के सामने अपनी जमीन पर रहने का संकट पैदा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इन लोगों को शर्तें पूरी न करने के कारण उनकी जमीन से बेदखल करने का नोटिस 17 राज्य सरकारों को भेजा है। साफ है कि कमलनाथ सरकार आदिवासी हितों की रक्षा के लिए जिस तरह से सजग और प्रतिबद्ध नजर आती है, केन्द्र की मोदी सरकार का आचरण ठीक उसके विपरीत प्रतीत हो रहा है।